सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

क्या ज़वाब दूँ ?
कुछ सोचकर मैं चुप हो गया
वो नादान 'कुंठित' सोच से
उबर पाया ही नहीं.

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

देश मेरा हुआ आज कंगाल है
नफरतें विष वमन कैसा भूचाल है
देश की सबको चिंता बहुत है मगर
देश की हर व्यवस्था ही बदहाल है .
@ सुधाकर आशावादी
देश मेरा हुआ आज बदहाल है
नफरतें विष वमन कैसा भूचाल है
देश की सबको चिंता बहुत है मगर
नेता के तन जड़ी भेड़िया खाल है .
@ सुधाकर आशावादी

देश को किया है तो वह है संकीर्ण सियासत
सियासत से ही बनाई है लोगों ने रियासत .
निसंदेह धर्म जाति की अलगाववादी अवधारणा ने
तथाकथित धर्मनिरपेक्षता को भी बदनाम कर दिया .
@ सुधाकर आशावादी

बुधवार, 7 सितंबर 2016

लघुकथा :
                                                               तमाशा

मदारी अपना थैला भिन्न भिन्न लुभावनी चीजों से भरने लगा।  उसे तमाशा दिखाने जी जाना था।
भीड़ सम्मुख थी , उसने डुगडुगी बजाई। भीड़ कौतुहल से मदारी के करतब देखने लगी। मदारी ने पहले लेपटॉप निकाला , भीड़ ने तालियाँ बजाई , फिर कन्या विद्या धन , उसके बाद अल्पसंख्यकों की पहिचान करने के लिए हाथ उठवाये।  भीड़ तमाशबीन थी। वह मदारी की चाल समझने लगी , कि मदारी उन्हीं के पैसे से करतब दिखा रहा है।
अंततः मदारी का खेल छोड़कर वे जाने लगे, जिनके लिए उसने लुभावनी चीजे थैले से निकाली ही नहीं थी।  मदारी भी कब हार मानने वाला था। भीड़ के सम्मुख प्रस्ताव रखा - 'यदि मुझे अगले बरसों में भी तमाशा दिखाने की मंजूरी दोगे , तब मैं सभी के लिए अपने पिटारे से स्मार्टफोन निकाल कर दूंगा।'
भीड़ आंकलन करने लगी। क्या स्मार्टफोन के बदले मदारी को मतलब सिद्ध करने का एक और अवसर दिया जाय या नहीं ? तमाशा अब भी जारी था। मदारी के अन्य परिजन भी अलग अलग नुक्कड़ों पर अपनी पोटली लिए डुगडुगी बजाने में व्यस्त थे।
- सुधाकर आशावादी

रविवार, 24 जुलाई 2016

रचनाकार ....

तुम किसी के बंधुआ कब से हो गए ?
तुम तो प्रकृति के अंश हो / वंश हो
तुम्हें रचने हैं प्रकृति के गीत / छंद / मुक्तक
जो देते हों प्रकृति के आकर्षक सौन्दर्य की उपमाएं
मन में जागृत करते हों जीवन के प्रति आकर्षण
गतिशीलता की महत्वाकांक्षाएं .
तुम देह नहीं विचार हो
विचारों से विचारों का मिलन कराने वाले आदर्श सूत्रधार
तुम कहाँ फंस गए
जाति- बिरादरी, धर्म- परम्पराओं ,
आस्थाओं / अनास्थाओं के फेर में .
तुम्हारी रचनाधर्मिता
प्रतिविम्ब है तुम्हारे वैचारिक सौन्दर्य का .
सत्यम शिवम् सुन्दरम् के उद्घोष का .
तुम सीमाओं से परे हो
अपना अर्थ जानो
अपने विराट अस्तित्व को पहचानो
संकीर्ण चिंतन में सिमटना
तुम्हारी उड़ान में सदैव बाधक था और रहेगा .
सो हे रचनाकार खुलकर उड़ो
मुक्त गगन में /
और बनो सन्देश वाहक -
अब कोई किसी का बंधुआ नहीं रहेगा
चालाक बहेलिये अब किसी को
अपनी मनोकामनाओं के जाल में फंसाने में
सफल नहीं होंगे .
@ डॉ. सुधाकर आशावादी