मंगलवार, 6 मार्च 2018

फेंक कंकड़ शान्त गहरी झील में
पूछते पानी में हलचल क्यूँ मची ?
कितने समझौते करेगी ज़िंदगी
बेबसी तेरी समझ आती मुझे।

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

तेरी इंसानियत ने मुझे इस कदर लुभाया है
भूल गया हूँ मैं मज़हब की संकरी गलियाँ .
@ सुधाकर आशावादी

गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

मुझे पसंद आया उसका अंदाज़
मज़हबी सोच से परे कुछ खास
इंसानी रिश्तों का मधुर एहसास
राह-ए-सफर में हुआ अनायास.

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

बिगड़ जाते हैं समीकरण कल्पनाओं के
समय का ऊँट लेता है जब करवटें अपनी.
@ सुधाकर आशावादी

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

जिंदगी तू कितना ही मुझे भटका पथरीली राहों पर
मैं भी जिद्दी हूँ... हार नहीं मानूंगा जीत मिलने तक .
@ सुधाकर आशावादी

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

चाहता हूँ सलीके से कोई बात कहूँ
पर मेरी साफगोई चापलूस नहीं है.
@ सुधाकर आशावादी