तेरी इंसानियत ने मुझे इस कदर लुभाया है
भूल गया हूँ मैं मज़हब की संकरी गलियाँ .
@ सुधाकर आशावादी
गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018
मुझे पसंद आया उसका अंदाज़ मज़हबी सोच से परे कुछ खास इंसानी रिश्तों का मधुर एहसास राह-ए-सफर में हुआ अनायास.
बुधवार, 7 फ़रवरी 2018
बिगड़ जाते हैं समीकरण कल्पनाओं के
समय का ऊँट लेता है जब करवटें अपनी.
@ सुधाकर आशावादी
मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018
जिंदगी तू कितना ही मुझे भटका पथरीली राहों पर
मैं भी जिद्दी हूँ... हार नहीं मानूंगा जीत मिलने तक .
@ सुधाकर आशावादी
शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018
चाहता हूँ सलीके से कोई बात कहूँ
पर मेरी साफगोई चापलूस नहीं है.
@ सुधाकर आशावादी
बुधवार, 31 जनवरी 2018
खुशनसीब हूँ , जो तूने मन की बात सुनी
उससे पूछ जिसकी किसी ने कुछ न सुनी .
@ सुधाकर आशावादी
धड़कनों को सुनों मत धड़कने दो
यहीं हैं जो देह का वजूद बनाती हैं .
@ सुधाकर आशावादी
मंगलवार, 9 जनवरी 2018
उसने गैरों में जाकर बुराई की अपने घर की
जैचंद न कहूँ तो क्या कहकर पुकारूँ उसको ?
सोमवार, 27 फ़रवरी 2017
क्या ज़वाब दूँ ? कुछ सोचकर मैं चुप हो गया वो नादान 'कुंठित' सोच से उबर पाया ही नहीं.
बुधवार, 22 फ़रवरी 2017
देश मेरा हुआ आज कंगाल है
नफरतें विष वमन कैसा भूचाल है
देश की सबको चिंता बहुत है मगर
देश की हर व्यवस्था ही बदहाल है . @ सुधाकर आशावादी
देश मेरा हुआ आज बदहाल है
नफरतें विष वमन कैसा भूचाल है
देश की सबको चिंता बहुत है मगर
नेता के तन जड़ी भेड़िया खाल है . @ सुधाकर आशावादी
देश को किया है तो वह है संकीर्ण सियासत
सियासत से ही बनाई है लोगों ने रियासत .
निसंदेह धर्म जाति की अलगाववादी अवधारणा ने
तथाकथित धर्मनिरपेक्षता को भी बदनाम कर दिया .
@ सुधाकर आशावादी